Thursday, May 12, 2016

चिता की भस्म क्यों लगाते है भगवान शिव

चिता की भस्म क्यों लगाते है भगवान शिव ।
भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं. भगवान शिव जितने सरल है उतने ही रहस्यमय भी हैं. उनका रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से भिन्न हैं.
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृगचर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है. भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है. संतों का भी एक मात्र वस्त्र भस्म ही है. अघोरी, संन्यासी और अन्य साधु भी अपने शरीर पर भस्म रमाते हैं. शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यामित्क कारण भी हैं.
शिव का शरीर पर भस्म लपेटने का दार्शनिक अर्थ यही है कि यह शरीर जिस पर हम गर्व करते हैं, जिसकी सुरक्षा का इतना इंतजाम करते हैं. इस भस्म के समान हो जाएगा. शरीर क्षणभंगुर है और आत्मा अनंत. शरीर की गति प्राण रहने तक ही है. इसके बाद यह श्री हीन, कांतिहीन हो जाता है.
भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है. इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती. रोम कूपों के ढंक जाने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती इससे शीत का अहसास नहीं होता और गर्मी में शरीर की नमी बाहर नहीं होती. इससे गर्मी से रक्षा होती है. परजीवी (मच्छर, खटमल आदि) जीव भी भस्म रमे शरीर से दूर रहते हैं.
ऐसा भी कहा जाता है एक बार भगवान शिव के सामने से एक मुर्दे को लेकर लोग जा रहे थे,भगवान शिव ने देखा कि लोग उस मुर्दे में पीछे पीछे चल रहे है और जो जो से कह रहे है राम नाम सत्य है राम नाम सत्य है,भगवान बोले ये तो मेरे प्रभु का नाम ले रहे है ये आगे कौन सा महान व्यक्ति जा रहा है जिसके पीछे लोग प्रभु का नाम ले रहे है भगवान भी उनके पीछे चलने लगे.और कहने लगे राम नाम सत्य है.
जब शमशान में पहुँचे तो भगवान शिव ने देखा कि सब ने कहना बंद कर दिया, और घर गृहस्थी कि बाते करने लगे कोई बोला दूकान खोलना है लेट हो रहा हूँ, कोई बोला इसको भी आज ही मरना था. शिव सोचने लगे इन्होने तो नाम लेना बंद ही कर दिया, फिर थोड़ी देर बार एक-एक करने सब चले गए,शिव जी वही शमशान में खड़े रहे,जब मुर्दा जल गया तो भगवान शिव बोले इसकी वजह से लोग मेरे प्रभु का नाम ले रहे थे ये तो बड़ा महान व्यक्ति है और तुरत भगवान ने उसकी चिता की भस्म लेकर अपने शरीर में मल ली,और तब से भस्म रमाने लगे।

दक्षिणेश्वर काली

दक्षिणेश्वर काली
कहते हैं इस कलियुग में भक्त और भगवान का जहां प्रत्यक्ष लीला दर्शन हुआ वहीं आज का दक्षिणेश्वर है जिसकी गणना न सिर्फ बंगाल वरन पूरे भारत के महानतम देवी तीर्थों में की जाती है। हुगली नदी के पूर्वी तट पर शोभायमान विश्व प्रसिद्ध काली मंदिर, द्वादश शिव मंदिर, साधना कक्ष व अन्यान्य देवी-देवताओं का मंदिर समूह ही दक्षिणेश्वर के नाम से जाना जाता है जहां साधक प्रवर रामकृष्ण माता काली के साक्षात दर्शनोपरांत साधना व योग के बल पर भारतीय महानात्माओं में परमहंस हुए। देवी पूजन, भक्त की निष्काम भक्ति, आस्था और समर्पण का प्रतीक यह स्थल आज कोलकाता के विशिष्ट तीर्थ के रूप में विभूषित है। कोलकाता आने वाले हर सैलानी की इच्छा यहां आकर मां काली के दर्शन करने की अवश्य होती है। साल के सभी दिन यहां भक्तों का आना-जाना चलता रहता है।
मंदिर स्थापना कथा: रानी रासमणि द्वारा वर्ष 1847 से 1855 ई के बीच कुल नौ लाख रूपए की लागत से निर्मित इस विशालकाय मंदिर की निर्माण कथा कुछ इस प्रकार है। रानी रासमणि, जो कोलकाता के दक्षिण भाग में अवस्थित जाॅन बाजार में निवास करती थीं, ने अपने पति राजा राजचंद्र दास की मृत्यु के बाद चारों पुत्रियों के विवाहोपरांत तीर्थ पर जाने का निश्चय किया। अतः एक दिन वह काशी जाने की तैयारी करने लगीं। यात्रा खर्च के लिए उन्होंने धन का बड़ा भाग निकालकर अलग रख लिया, पर जाने के एक दिन पूर्व रात्रि में स्वप्न में उन्हें मां काली का दर्शन हुआ। मां ने स्वप्न में कहा- ‘‘काशी की यात्रा पर मत जाओ, बल्कि पहले भागीरथी के किनारे मेरा एक मंदिर बनवाओ। मंदिर सुंदर बनना चाहिए। मंदिर बनवाने के बाद उसमें नित्य मेरी पूजा की व्यवस्था हो ताकि मैं वहां तुम्हारी पूजा नित्य ग्रहण कर सकूं।’’
स्वप्न में मिले इस आदेश को रानी ने गंभीरता से लिया और भागीरथी के किनारे दक्षिणेश्वर गांव की तकरीबन पचास बीघा जमीन खरीद ली। सात वर्षों के अनवरत निर्माण के बाद 31 मई सन् 1855 को यहां देवी की प्राण प्रतिष्ठा भव्य समारोह के साथ की गई। ब्राह्मण विरोध और पुजारी की नियुक्ति: भक्ति भाव में जात-पांत क्या? पर भारतीय समाज में जाति संस्कार का जोर तो पुरातन काल से ही मिलता है। रानी धीवर जाति की थीं, इस कारण यहां कोई अच्छा ब्राह्मण नहीं आता। उस समय एक सामाजिक विधान था कि कोई ब्राह्मण शूद्र के मंदिर को प्रणाम भी नहीं करेगा, पूजा की बात दूर है। रानी ने ऐसे में स्वयं ही पूजा करने की बात सोची पर पुनः विचार आया कि ‘देव पूजन में शास्त्र के विरुद्ध आचरण कतई उचित नहीं।’
ऐसे में रानी की भेंट कोलकाता से तकरीबन एक सौ किलोमीटर दूर स्थित गांव कमारपुकुर के क्षुदीराम चट्टोपाध्याय के विद्वान ज्येष्ठ पुत्र रामकुमार से हुई जो उस समय कोलकाता में ही रहते थे। रामकुमार जी ने मंदिर के पुजारी नियुक्त होते ही यहां की सारी व्यवस्था अपने हाथों में ले ली और रानी की सारी चिंता दूर हो गई। गदाधर का पदार्पण: रामकुमार के पुजारी बनने की बात उनके अनुज गदाधर (श्री रामकृष्ण का मूल नाम) को ठीक नहीं लगी। उन्होंने सोचा हमारे पिता जी ने कभी शूद्रों का दान तक नहीं लिया जबकि मेरा बड़ा भाई तो शूद्रों की गुलामी करने लगा है। यह सोचकर गदाधर ने बड़े भाई को नौकरी छोड़ने की सलाह दी पर फिर पर्ची निकालकर निर्णय लिए जाने के क्रम में सही पक्ष रामकुमार की तरफ हो जाने के कारण गदाधर बाद में इस विषय पर कुछ नहीं बोले। यहां तक कि गदाधर वहां का प्रसाद तक नहीं लेते। रामकुमार ने कहा- ‘भाई तू एक काम कर, जाकर खाद्य सामग्री ले आ और गंगा जी के बालू पर पका। इससे सारी वस्तुएं पवित्र हो जाती हैं।’ तभी से गदाधर वहां अपने द्वारा पकाया खाना खाने लगे और दक्षिणेश्वर उनका स्थायी निवास बन गया। यहां काली के मंदिर में गदाधर जब भी भजन कीर्तन करते, सारा परिवेश धर्ममय हो जाता था। उनके इसी भक्तिभाव ने ऐसा संदेश व सुयोग उत्पन्न किया कि वे वर्ष 1856 से काली मां के स्थायी सेवक हो गए।
इधर भाई को नौकरी देकर रामकुमार भी निश्चिंत हो गए। गदाधर के हृदय में यह बदलाव रानी के तीसरे दामाद मधुरनाथ के कारण ही आया। गदाधर के आगमन के बाद ही यहां की आरती, पूजा और शृंगार की भव्यता और उसमें श्रद्धातत्व के समावेश की चर्चा चहुं ओर फैल गई। वर्तमान संदर्भ: लगभग 20 एकड़ भूखंड पर स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर के परिसर में पहुंचते ही अपूर्व शांति, शक्ति व श्रद्धा रूपी त्रितत्व का स्पष्ट आभास होता है, जिसके एक तरफ पतित पावनी गंगा का दर्शन मनभावन और सुखकर प्रतीत होता है। पूर्व में इसे भवतारिणी मंदिर कहा जाता था। बाद में अविभाजित बंगाल के दक्षिण शोणितपुर गांव के दक्षिण छोर पर शिव के इन बारह मंदिरों के स्थित होने के कारण इस तीर्थ को दक्षिणेश्वर कहा जाने लगा।
दर्शनीय स्थल: दक्षिणेश्वर का प्रधान दर्शनीय स्थल है मां काली का मंदिर। प्रांगण में प्रवेश होते ही मुख्य द्वार के ऊपर लिखा वाक्य ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’’ यहां आए हर भक्त को प्रेरणा प्रदान करता है। आठ भागों विभक्त प्रधान मंदिर के छत्र पर नौ शिखर हैं जिनमें मुख्य शिखर की ऊंचाई करीब 100 फुट है। नीचे 20 फुट वर्गाकार गर्भगृह है जिसकी मुख्य पादपीठिका पर सुंदर सहस्रदल कमल पर भगवान शिव की संगमरमर की लेटी प्रतिमा विराजमान है। इनके वक्षःस्थल पर एक पांव रखे, नरमुंडों का हार पहने, लाल जिह्वा बाहर निकाले और मस्तक पर भृकुटियों के बीच ज्ञान नेत्र लिए मां काली का चतुर्मुखी विग्रह प्रेरणादायक है। मां की यह मुद्रा दुष्टों के लिए भले ही भयंकर हो, पर भक्तों के लिए यह अभयमुद्रा, वरमुद्रा वाली करुणामयी भवतारिणी मां हैं।
काली मंदिर के उत्तर में राधाकांत मंदिर (विष्णु मंदिर) और दक्षिण में नट मंदिर है। मंदिर की छत में माला जपते भैरव विद्यमान हैं। इस मंदिर के पीछे भंडारगृह और पाकशाला है जहां भक्तों के लिए नित्य महाभोग की व्यवस्था होती है। दक्षिणेश्वर में मां के मंदिर के ठीक सामने बंग शैली में निर्मित एक ही आकार प्रकार के शिव के बारह मंदिर शोभायमान हैं।
मंदिर के प्रांगण के बाहर पंचवटी नामक ऐतिहासिक वृक्ष संगम स्थली है जहां अशोक, आंवले, पीपल, वट और बेल के वृक्ष एक साथ विद्यमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर रानी जी का एक मंदिर देखा जा सकता है जिसके चारों तरफ लोहे के फाटक में 21 अंकित हैं। पास में ही मां शारदा का मंदिर है। यहां का कल्पतरु उत्सव प्रसिद्ध है जिसमें दूर देश के भक्त भी भाग लेते हैं।
बेलूर मठ: हुगली नदी के एक तरफ दक्षिणेश्वर है तो उसके ठीक तिर्यक दूसरी तरफ बेलूर मठ है जहां दक्षिणेश्वर से मोटर बोट व पानी के छोटे जहाज से जाना सहज है। यहां रामकृष्ण जी के अतिरिक्त मां शारदा, विवेकानंद व अन्य साधकों की समाधि स्थलियों के साथ-साथ स्वामी विवेकानंद निवास कक्ष व प्राचीन आम्रवृक्ष आदि दर्शनीय हैं। भक्त यहां नित्य भोग का भी आनंद लेते हैं। यहीं रामकृष्ण मिशन का कार्यालय है जहां विभिन्न धार्मिक विषयों की पुस्तकों को पढ़ने का लाभ उठाया जा सकता है। इस तरह यह कहना समीचीन जान पड़ता है कि इस कलियुग में महाकाल की अधिष्ठात्री शक्ति महामाया काली का यह स्थान परम शान्ति प्रदान करने वाला व कल्याण करने वाला है.

Wednesday, May 11, 2016

तिजोरी के चमत्कारिक टोटके, हो जाएंगे मालामाल

तिजोरी के चमत्कारिक टोटके, हो जाएंगे मालामाल
तिजोरी और अलमारी में फर्क है। अक्सर यह देखा गया है कि गोदरेज की अलमारी में ही अंदर एक तिजोरी होती है। इस तिजोरी को किस दिशा में कैसा रखना चाहिए, इसमें क्या-क्या होना चाहिए और क्या-क्या नहीं यह वास्तु का विषय है।
हम यहां वास्तु नहीं बल्कि ज्योतिषियों द्वारा बताए गए ‍तिजोरी के उपाय के संबंध में बताएंगे। आप इन उपायों को आजमा कर धन और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। आप इनमें से दो या तीन उपाय ही करें, सभी नहीं।
तिजोरी में रखें पूजा की सुपारी : पूजा की सुपारी पूर्ण एवं अखंडित होती है। इसीलिए इसको पूजा के समय गौरी-गणेश का रूप मानकर उस पर जनेऊ चढ़ाई जाती है। बाद में उस पूजा की सुपारी को तिजोरी में रखना चाहिए क्योंकि जहां गणेशजी यानी बुद्धि के स्वामी का निवास होता है वहीं लक्ष्मी का निवास होता है। इससे घर में लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है।
लक्ष्मी पूजन में सुपारी रखें। सुपारी पर लाल धागा लपेटकर अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि पूजन सामग्री से पूजा करें और पूजन के बाद इस सुपारी को तिजोरी में रखें।
तिजोरी में रखें ये वस्तुएं : शुक्रवार को पीले कपड़े में 5 कौड़ी और थोड़ी-सी केसर, चांदी के सिक्के के साथ बांधकर तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रख दें। उसके साथ थोड़ी सी हल्दी की गांठें भी रख दें। कुछ दिनों में ही इसका असर होने लगेगा और धन समृद्धि के रास्ते खुल जाएंगे।
रहेगी सदा बरकत इस उपाय से : तिजोरी में 10-10 के नोट की एक गड्डी रखें और कुछ पीतल और तांबें के सिक्के भी रखे। पीले सिक्के होंगे तो वह भी चल जाएंगे। कुछ सिक्के आपकी जेब में भी रखें। ध्यान रखें कि सिक्के जर्मन या एल्युमिनियम वाले न हों।
पीपल का पत्ता : एक पीपल का पत्ता लें और देशी घी में मिश्रित लाल सिंदूर से उस पर ॐ लिख कर इसे तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रख दें। ऐसा कम से कम पांच शनिवार करेंगे तो पांच पत्ते हो जाएंगे। इससे धन संबंधित तंगी दूर हो जाएगी।
पीली कौड़ी : पुष्य नक्षत्र के दिन शाम के समय लक्ष्मी पूजन करें। पूजन में पुराने चांदी के सिक्के और रुपयों के साथ कौड़ी रखकर उनका केसर और हल्दी से पूजन करें। पूजा के बाद इन्हें तिजोरी में रख दें। आपकी तिजोरी हमेशा पैसों से भरी रहेगी।
दक्षिणावर्ती शंख रखें : तंत्र-मंत्र में दक्षिणावर्ती शंख का विशेष महत्व है। इसे घर के पूजा स्थान या तिजोरी में रखने से रंक भी राजा बन जाता है। ये बहुत ही चमत्कारी उपाय है। सोम-पुष्य योग में इसे घर में रखने से सुख-समृद्धि बनी रहेगी। दरअसल यह शंख लक्ष्मीमाता को आकर्षित करने वाला होता है।
भोजपत्र : अखंडित भोजपत्र पर लाल चंदन को पानी में घोल लें और उसको इंक जैसा इस्तेमाल करते हुए मोर पंख से 'श्रीं' लिखें। अब इस भोजपत्र को तिजोरी में रख दें। कुछ ही दिनों में फायदा शुरू होने लगेगा। पैसा बढ़ता चला जाएगा।
बहेड़ा की जड़ : बहेड़ा सहज सुलभ फल है। इसका पेड़ बहुत बड़ा, महुआ के पेड़ जैसा होता है। रवि-पुष्य के दिन इसकी जड़ या पत्ते लाकर उनकी पूजा करें, तत्पश्चात् इन्हें लाल वस्त्र में बांधकर भंडारगृह या तिजोरी में रख दें। यह उपाय आपकी समृद्धि बढ़ाएगा।
शंखपुष्पी की जड़ : पुष्य-नक्षत्र के दिन शंखपुष्पी की जड़ लाकर, इसे देव-प्रतिमाओं की भांति पूजें और इसके पश्‍चात्य चांदी की डिब्बी में प्रतिष्ठित करके, उस डिब्बी को धन की पेटी, तिजोरी, भण्डारघर अथवा बक्से में रख दें। यह टोटका लक्ष्मीजी की कृपा कराने में अत्यन्त समर्थ है। हर गुरु-पुष्य के दिन शंखपुष्पी की जड़ व चांदी की डिब्बी बदल दें। पहले वाली बहते पानी में प्रवाह कर दें।
यंत्र स्थापना : ऐश्वर्य वृद्धि यंत्र या धनदा यंत्र की स्थापना करें। दोनों में से से किसी भी एक यंत्र को विधिवत रूप से पूजन करके उसे धन रखने के स्थान पर या तिजोरी में रख दें। इससे आपकी तिजोरी कभी भी खाली नहीं रहेगी और धन बढ़ता ही जाएगा।
काली गुंजा : धन-संपदा के लिए तिजोरी के नीचे या तिजोरी के अंदर काली गुंजा के ग्यारह दाने पवित्र करके रखें। धन रखने के स्थान पर या तिजोरी में हमेशा लाल वस्त्र बिछाएं। दूकान में तिजोरी के पास लक्ष्मी गणेश की तस्वीर लगाएं।
व्यापार में लाभ हेतु : होली के दिन गुलाल के एक खुले पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक सिक्का रखकर उसे नए लाल कपडे में लाल मौली से बांधकर तिजोरी में रखें, व्यवसाय में लाभ होगा।
इसके अलावा व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो किसी भी शनिवार के दिन नीले कपड़े 21 दानें रक्त गुंजा के बांधकर तिजोरी में रख दें। अपने इष्टदेव का ध्यान करते हुए हर रोज धूप, दीप अवश्य दिखाएं। ऐसा नियमित करने से व्यापार में लाभ मिलेगा और सफलता भी प्राप्त होगी।
श्रीफल : किसी शुभ मुहूर्त में श्रीलक्ष्मी फल को लाल कपड़े में रखकर उस पर कामिया सिन्दूर, देशी कपूर तथा साबुत लौंग चढ़ाकर धूप–दीप देकर एवं कुछ दक्षिणा अर्पित करके अपने गल्ले या तिजोरी में रखें।
इससे धन में वृद्धि होती चली जाएगी। यदि एक नारियल चमकदार लाल कपड़े में लपेटकर धन रखने के स्थान पर रखा जाए तो शीघ्र ही धन का आगमन होगा।

Sunday, December 27, 2015

माँ शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ ।

माँ शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ ।
माता शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ में भक्तों की गहरी आस्था है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में माता का सुंदर स्थान विराजमान है। सहारनपुर नगर से 25कि.मी तथा हरियाणा प्रांत के यमुनानगर से लगभग 50 कि.मी. दूर यह पावन धाम स्थापित है। शिवालिक पहाड़ियों के मध्य से बहती बरसाती नदी के बीच में मंदिर रूप में माता का दरबार सजा हुआ है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता उनकी हर प्रकार से रक्षा करती हैं तथा उनकी झोली सुख-संपत्ति से भर देती हैं। मंदिर के गर्भ गृह में मुख्य प्रतिमा माता शाकुम्भरी देवी की है। माता की दाईं तरफ माता भीमा देवी व भ्रामरी देवी और बाईं तरफ मां शताक्षी देवी विराजमान हैं।
माता शाकुम्भरी अपने भक्तों द्वारा याद करने पर अवश्य आती हैं। इस संबध में एक प्राचीन कथा का उल्लेख आता है। एक समय में दुर्गम नाम का एक असुर था। उसने घोर तप द्वारा ब्रह्मदेव को प्रसन्न करके देवताओं पर विजय पाने का वरदान प्राप्त कर लिया। वर पाते ही उसने मनुष्यों पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। अंतत: वरदान के कारण उसने देवताओं पर भी विजय प्राप्त कर ली। चारों वेद भी दुर्गम ने इंद्र देव से छीन लिए। वेदों के ना होने पर चारों वर्ण कर्महीन हो गए। यज्ञ-होम इत्यादि समस्त कर्मकांड बंद होने से देवताओं का तेज जाता रहा, वे प्रभावहीन होकर जंगलों में जाकर छिप गए। प्रकृति के नियमों से छेड़ छाड़ होने पर सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई। सारी पृथ्वी पर भयंकर सूखा पड़ गया जिस कारण सारी वनस्पतियां सूख गईं। खेतों में फसलें नष्ट हो गईं। ऐसी परिस्थितियों में देवता व मानव दोनों मिल कर मां अंबे की स्तुति करने लगे।
बच्चों की पुकार सुन कर मां ना आए ऐसा भला कभी हो सकता है? भक्तों की करुण आवाज पर माता भगवती तुरंत प्रकट हो गईं। देवताओं व मानवों की दुर्दशा देख कर मां के सौ नेत्रों से करुणा के आंसुओं की धाराएं फूट पड़ीं। सागरमयी आंखों से हजारों धाराओं के रूप में दया रूपी जल बहने के कारण शीघ्र ही सारी वनस्पतियां हरी-भरी हो गईं। पेड़ पौधे नए पत्तों व फूलों से भर गए। इसके तुरंत बाद माता ने अपनी माया से शाक, फल, सब्जियां व अन्य कई खाद्य पदार्थ उत्पन्न किये। जिन्हें खाकर देवताओं सहित सभी प्राणियों ने अपनी भूख-प्यास शांत की। समस्त प्रकृति में प्राणों का संचार होने लगा। पशु व पक्षी फिर से चहचहाने लगे। चारों तरफ शांति का प्रकाश फैल गया। इसके तुरंत बाद सभी मिलकर मां का गुणगान गाने लगे। चूंकि मां ने अपने शत अर्थात् सौ नेत्रों से करुणा की वर्षा की थी इसलिए उन्हें शताक्षी नाम से पुकारा गया। इसी प्रकार विभिन्न शाक आहार उत्पन्न करने के कारण भक्तों ने माता की शाकुम्भरी नाम से पूजा-अर्चना की।
अंबे भवानी की जय-जयकार सुनकर मां का एक परम भक्त भूरादेव भी अपने पांच साथियों चंगल, मंगल, रोड़ा, झोड़ा व मानसिंह सहित वहां आ पहुंचा। उसने भी माता की अराधना गाई। अब मां ने देवताओं से पूछा कि वे कैसे उनका कल्याण करें? इस पर देवताओं ने माता से वेदों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की, ताकि सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से चल सके। इस प्रकार मां के नेतृत्व में देवताओं ने फिर से राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। युद्ध भूमि में भूरादेव और उसके साथियों ने दानवों में खलबली मचा दी। इस बीच दानवों के सेनापति शुम्भ निशुम्भ का भी संहार हो गया। ऐसा होने पर रक्तबीज नामक दैत्य ने मारकाट मचाते हुए भूरादेव व कई देवताओं का वध कर दिया। रक्तबीज के रक्त की जितनी बंूदें धरती पर गिरतीं उतने ही और राक्षस प्रकट हो जाते थे। तब मां ने महाकाली का रूप धर कर घोर गर्जना द्वारा युद्ध भूमि में कंपन उत्पन्न कर दिया। डर के मारे असुर भागने लगे। मां काली ने रक्तबीज को पकड़ कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। उसके रक्त को धरती पर गिरने से पूर्व ही मां ने चूस लिया। इस प्रकार रक्तबीज का अंत हो गया। अब दुर्गम की बारी थी। रक्तबीज का संहार देखकर वह युद्ध भूमि से भागने लगा परंतु मां उसके सम्मुख प्रकट हो गई। दुर्गा ने उसकी छाती पर त्रिशूल से प्रहार किया। एक ही वार में दुर्गम यमलोक पहुंच गया। अब शेर पर सवार होकर मां युध्द भूमि का निरीक्षण करने लगीं। तभी मां को भूरादेव का शव दिखाई दिया। मां ने संजीवनी विद्या के प्रयोग से उसे जीवित कर दिया तथा उसकी वीरता व भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि जो भी भक्त मेरे दर्शन हेतु आएंगे वे पहले भूरादेव के दर्शन करेंगे। तभी उनकी यात्रा पूर्ण मानी जाएगी। आज भी मां के दरबार से आधा कि.मी. पहले भूरादेव का मंदिर है। जहां पहले दर्शन किये जाते हैं।
इस प्रकार देवताओं को अभयदान देकर मां शाकुम्भरी नाम से यहां स्थापित हो गईं। माता के मंदिर में हर समय श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्रों व अष्टमी के अवसर पर यहां अत्यधिक भीड़ होती है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश व आसपास के कई प्रदेशों के निवासियों में माता को कुल देवी के रूप में पूजा जाता है। परिवार के हर शुभ कार्य के समय यहां आकर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। लोग धन धान्य व अन्य चढ़ावे लेकर यहां मनौतियां मांगने आते हैं। उनका अटूट विश्वास है कि माता उनके परिवार को भरपूर प्यार व खुशहाली प्रदान करेंगी। हर मास की अष्टमी व चौदस को बसों, ट्रकों व ट्रैक्टर टालियों में भर कर श्रद्धालु यहां आते हैं। स्थान-स्थान पर भोजन बनाकर माता के भंडारे लगाए जाते हैं। माता के मंदिर के इर्द-गिर्द कई अन्य मंदिर भी हैं